कहर


Requesting all Indians to think beyond their religion.

देश में लगी इस आग का कौन ज़िम्मेदार है
कही मर रहा हिन्दू तो कही मरता मुसलमान है

हम भाइयो के बीच छिड़ी ये कैसी जंग है
तलवारे निकली नहीं पर बोलचाल बंद है

गोश्त और अज़ान के नाम पे भिड़ने को हम तैयार है
मज़हब हम समझे नहीं पर मरने को तैयार है

हमारी दोस्ती में घोला किसने कैसा ये जहर है
लड़े हम है नहीं पर द्वेष ने बरपाया कहर है

हर मील पे साथ जो हाथ थे, आज मिलने से कतराते है
एक थाली में खाते जो साथ थे , आज मज़हब के डर से भूखे ही सो जाते है

जान से प्यारा भारत अब परदेसी हो गया है 
जय हिन्द कहना भी हमको अधर्मी जो कर गया है

मोहब्बत सिखाने वाले मज़हब सारे आज हुए कातिल है
मासूमो का खून बहा कर क्या कुछ हुआ किसी को हासिल है

मज़हब की पट्टी डाले अंधकार में  क्यों हम है
सियासत के है खेल सारे फिर लड़े क्यों हम है

नफरत की इस आग में झुलस रहा देश हमारा है 
एक बार फिर क्या भारत का होना बटवारा है

द्वेष की पगडण्डी पे चले क्यों हम  है
भाईचारे के पाठ आज पड़े क्यों कम है 

इतिहास सिखाता एक ही पाठ है
ग्रह कलेश से घोर ना कोई अपराध है

सर्द में भी झुलसाती इस आग से निकलना हमको आज है
देश ना सही इंसानियत के लिए बदलना हमको आज है 

कुछ पल ही सही भेद भाव भुला कर देखते हैं
नफरत मिटा ना सके तो छुपा कर देखते हैं 

क्यों न मज़हब से बड़ा इंसान को बना कर देखते हैं 
तो चलो इंसानियत के लिया ये कदम भी उठा कर देखते है 

© Umang

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