सत्ता की खातिर










कुछ समझ नहीं आता ये किस मोड़ पे हम आगाये
एक तरफ है भक्त और दूसरी और मार्क्स के दीवाने

आभास ये हमको हुआ की चुनाव की है हमको आजादी
दिल तो साला तब टूटा जब दिखी हमको सब बेईमानी

भक्ति की भक्ति समाज था हमको सिखाता
मार्क्स से यारी करने को शिक्षक था उकसाता

दबाव था बहुत, अठारवी सालगिरह थी द्वारे खड़ी
निर्णय हमारा सुनने को ईवीएम थी बेताब बड़ी

हलचल थी दिल मे मची, कतार में थे जब खडे
निर्णय तो करलिये, एक आखरी बार विचार में पडे

हसिया दूर फ़ेंक कमल था हमने उठाया
नीला एक बटन दबा कर निर्णय अपना खुद को सुनाया

आसान लगी प्रक्रिया हमको, बे मतलब थे परेशान हुए
असली खेल हुआ तब शुरू, जब अधिकारी थे गिनती में लगे

कमल का जो परचम लहराया निर्णय को हमारे मोहर लगाया
उत्साह था इतना, मनो हमको था किसी ने मंत्री बनाया

बात को ये कुछ साल हुए है, हम भी कुछ जवान हुए है
बचपान पीछे छोड़, समझदारी में छलांग लिए है

भक्त कब हमारी पहचान बनी हमको हुआ एहसास नहीं
क्या है माईने इसके, इसका भी था अंदाज़ नहीं

सवाल जब अभक्तो से किया, तो जवाब था बहुत खूब मिला
कहा एक महापुरुष ने, मोदी हो पसंद तो भक्त का ही मिलेगा बिल्ला

तर्क था इसमे क्या, ये जानने की थी हममे हिम्मत नहीं
ऐसे बुद्धिजीवो के समक्ष खडे होने की, और थी ताकत नहीं

हाँ कुछ पल तो हुए थे उदास हम, झूट बोलेंगे नहीं
कल तक थे भाई जो सब, आज गुटों में बटे वही

मायूसी को ताकत बनाके, निकल पडे ये समझ पाने
भेद है असली कोई, या है बस सत्ता पाने के बहाने

बिल्ला रख बस्ते मे, निकले सच की तलाश में
ख़ोज बीन के बाद हम, पहुचे विपक्षी गढ़ में

देश तो था वो हमारा ही, पर दुनिया थी ये विचित्र बड़ी
बदन में तो थे खादी के कुर्ते पर जेबों में तकनीक सबसे नयी

अद्भुत थी बातें उनकी समूहों में चलते चर्चे उनके
समझ नहीं आता हमे के कैसे, हर बात उनकी मोदी पे ही आके रुके

शांत थे कुछ वक़्त हम, प्रदर्शन भी सारे देखें हमने
जितना समझे उतना जाने, मूर्ख थे वे सारे बडे

मार्क्स, माओ और स्टालिन को बताते वो भगवान् थे
खुद थे अंधभक्ति मे डूबे और हमको करते बदनाम थे

मोदी से चिढ इतनी, की सोच सारी कही दान करी
बिन जांचे बिन परखे, गौरी की मौत भी हमारे ही नाम करी

अफज़ल की कानूनी फांसी खटकती है उनको बड़ी
और यहाँ बेमतलब हमको, बता दिया गौरी का अपराधी

तिलमिला गए ये बिचारे जब गौरी की हत्या हुई
पर सुलगी आग दिल में जब यहाँ बाण मे गयी जाने कई

खोखली है इनकी बाते सब ही, झूटे है सब इनके दावे
कहाँ गए प्रदर्शन जब ये शहर था बाण के हवाले

कहा गयी वो आग जो तुम्हारे हृदय को थी झुलसाती
क्यों आज मरते लोगो खातिर तेरी आवाज़ निकल पाती

खुद को हमारा रखवाला बताते, हर दिन सरकार से भिडे है
पर खुद सत्ता मे आने का सपना वो दिल में पाले है

बंद करो ये नाटक अब, तुम हो कोई पुरषोत्तम राम नहीं
ताकत पाने की खातिर कब तक रचो के स्वांग यूही

दोगली तेरी बातो ने प्रदा तेरा फाश करा
देखलो ज़रा झाँक कर, तुम भी अपना असली चेहरा

भक्त कहो हमे या कहो हमे परवाना
कम से कम तेरी भाति, झूठा नहीं मेरा अफसाना

सत्ता की जंग में हमसे भिडने जो तुम आए हो
याद रखना, रावण बन राम से लड़ने आए हो

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