सत्ता की खातिर
कुछ समझ नहीं आता ये किस मोड़ पे हम आगाये एक तरफ है भक्त और दूसरी और मार्क्स के दीवाने आभास ये हमको हुआ की चुनाव की है हमको आजादी दिल तो साला तब टूटा जब दिखी हमको सब बेईमानी भक्ति की भक्ति समाज था हमको सिखाता मार्क्स से यारी करने को शिक्षक था उकसाता दबाव था बहुत, अठारवी सालगिरह थी द्वारे खड़ी निर्णय हमारा सुनने को ईवीएम थी बेताब बड़ी हलचल थी दिल मे मची, कतार में थे जब खडे निर्णय तो करलिये , एक आखरी बार विचार में पडे हसिया दूर फ़ेंक कमल था हमने उठाया नीला एक बटन दबा कर निर्णय अपना खुद को सुनाया आसान लगी प्रक्रिया हमको, बे मतलब थे परेशान हुए असली खेल हुआ तब शुरू , जब अधिकारी थे गिनती में लगे कमल का जो परचम लहराया निर्णय को हमारे मोहर लगाया उत्साह था इतना , मनो हमको था किसी ने मंत्री बनाया बात को ये कुछ साल हुए है , हम भी कुछ जवान हुए है बचपान पीछे छोड़ , समझदारी में छलांग लिए है भक्त ...
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